मेरी जीवनी

खण्ड तीन

जून की भयंकर गर्मी शुरू हो गयी थी. इलाहाबाद से ऐम.ए. की परीक्षा दे कर गांव चला गया था. कानपुर से दादा ने सूचना भेजी कि मैं पास हो गया हूं. बम्बई से एक तार आया हुआ है. किसी इंटरव्यू के लिए बम्बई जाने की बात है. दूसरे ही दिन मैं कानपुर के लिए रवाना हो गया. साथ में पत्नी और डेढ़ साल का बेटा मुन्ना. कानपुर तक तो इन का साथ ठीक है. आगे क्या होगा. इन दोनों को तो दादा-भाभी के पास छोड़ना पड़ेगा. बम्बई जैसे अनजाने महानगर में, निर्धन और साधनहीन. मैं कैसे क्या करूंगा, कहां ठहरुंगा. इन सवालों में उलझा हुआ कानपुर पहुंचा.

तार सेंट क्ज़ेवियर्स कौलेज के प्रिंसिपल फादर ऐम.ऐम. बालागिअर का था. Please attend interview June 26 Elphinstone College for Hindi lecturer. एक ओर तुरन्त नौकरी पाने की अपार खुशी और दूसरी ओर चिन्ताओं के पहाड़. न मेरे पास कोई ठीक-ठाक कपड़े थे. दो धोती-जामा और पुराने कुर्ते और एक दोस्त की शादी पर बनवाई खद्दर की एक बंडी. इन्ही को धो-सुखा कर काम चल रहा था.   जूते तो कभी पहने ही नहीं थे. जो चप्पलें थीं, वे भी टूटी हुई. जे.सी. कुमरप्पा से गांधी आश्रम में पुरानी धोती से धोतीजामा सिलना सीख लिया था, जिन्हें खुद ही सी लेता था. आश्रम में चप्पलें गांठना भी सीख गया था. तो वे ही चप्पलें थीं. गांधी आश्रम और विश्वविद्यालय तक के लिए तो यह रूप ठीक था. स्वयं कात-बुन कर साल में 30 गज खादी पर काम चलाने वाले के लिए अब बड़ी समस्या पैदा हो गयी. इंटरव्यू में जाऊं, तो क्या पहन कर.

बम्बई के बारे में मैं ने कभी सोचा भी न था. यह कैसे हो गया. फादर बालागिअर को जानता भी नहीं था. इलाहाबाद के परिसर में जैसे कभी-कबार फादर कामिल बुल्के दिख जाते थे उसी तरह एक और वैसे ही पादरी सफ़ेद चोंगे में अक्सर दिखायी देते थे. सहपाठी नैथानी से उन का नाम सुना तो था और यह भी जानता था कि वे फादर को हिन्दी सिखाते हैं. नैथानी ने कभी शायद परिचय करवाया था. ठीक से याद नहीं आता. मन में अचरज का भाव था कि मुझे ही क्यों याद किया गया. इस का रहस्य तब खुला जब मैं बम्बई पहुंचा. लेकिन मेरे लिए यह यात्रा बहुत ही कठिन साबित हुई.

दादा-भाभी भले ही न सोचते रहे हों कि मुझ पर होने वाले खर्चे से छुटकारा मिले, लेकिन मै तो उस बोझ से मुक्ति चाहता था. अब मिलनेवाली नौकरी के लिए उन्हें और अधिक खर्च में डालूं. पशोपेश में फंसे अपने पति की चिन्ता को कैसे दूर करें, यह फिकर मेरी पत्नी को भी सता रही थी. खूब खोज-बीन करने पर जो रुपये उन्हें अपने पास मिले, वे मुझे सौंप दिये. केवल 76 रुपये थे. किसे और कैसे बताऊं. शर्म के मारे तो आधी मौत तो उसी समय हो गयी. अकेले में बहुत रोना आया. इस धन से रेल के किराये का काम भले ही चल जाये लेकिन कपड़ों का प्रबन्ध कैसे होगा. दादा-भाभी शायद सोच भी न सकते थे कि मैं इतना फटेहाल हूं. दादा चालीस और दद्दा जी बीस रुपये हर महीने चार साल तक देते रहे लेकिन दो महीने गर्मी की छुट्टियों में नहीं देते थे. उन दिनों या तो गांव या बरिगवां (सुसराल) या फिर कानपुर में रहता था. अर्थात हौस्टल में नहीं रहता था, तो रुपयों की कोई ज़रूरत भी न थी. ऐसा माना जाता था. सुसराल से विदाई के समय सासु से दस रुपये मिल जाते थे. कोई खर्चीली आदतें भी नहीं थीं. न सिनेमा का शौक और न चटोरा था. भैया को ये शौक थे. कभी-कभी वे मुझे भी साथ ले लेते थे. तो पैसों की क्या ज़रूरत.

बहरहाल इस समय तो सख्त़ ज़रूरत थी और कपड़ों के लिए तो काफ़ी-कुछ पैसों की ज़रूरत थी. कानपुर में कोई ऐसा दोस्त भी न था कि उस से उधार मांग लेता. ओमप्रकाश उस समय अपनी नायब तहसीलदारी की ट्रेनिंग के लिए खागा में थे. भाभी की बड़ी बहन गोपाल टाकीज़ के पास ही अपने पति के साथ रहती थीं. बनखण्डेश्वर पर जहां हम रहते थे, वहां से एकदम नज़दीक. उन के पति वैद्य थे और वे अपनी वैदिकी में काफी रात तक बैठते थे. बड़ा भव्य व्यक्तित्व था. चौड़े माथे पर ऊपर की ओर उल्टे कढ़े बाल, लम्बी नाक. पान से भरे गाल. मुंह ऊपर उठा कर बड़े रुआब से बोलते थे. चाहे राजनीति हो या वैदिकी, अधिकार के साथ बोलते थे. उन से बात करने में डर लगता था. फिर भी, मालूम नहीं क्यों, मुझ से स्नेह के साथ बोलते थे. और बहुत बातें करते थे. शायद इसलिए कि मैं गांधी का भक्त था और ऐम.ए. कर रहा था. अपनी वैदिकी और राजनीतिक ज्ञान का प्रभाव डालना चाहते थे. कभी-कभी उन के दफ़्तर में वैसे भी चला जाया करता था. तो सोचा कि अगर सौ रुपये इन से उधार मांग लिये जायें तो काम चल जायेगा. और वही किया. अपनी स्थिति को स्पष्ट करते हुए मैं ने रुपयों की मांग की और साथ ही एक शर्त भी पेश की. जिज्जी से (भाभी की बड़ी बहन) इस के बारे में कभी कुछ न कहेंगे. छै महीनों के पहले ही रुपये वापस कर दूंगा. प्यार से समझाते हुए तुरन्त रुपये दे दिये. मेरी खुशी का कोई ठिकाना न था. उन के पैरों की ओर झुका, तो उन्होंने लपक कर रोकते हुए मुझे ऊपर उठा लिया.

न्यामत मिल गयी थी. रेल भाड़ा बीबी से मिल ही चुका था, अब कपड़ों का प्रबन्ध करना था. सीधे खादी भण्डार के लिए जनरल गंज गया. जल्दी के लिए आज इक्के से मूलगंज चौराहे तक गया. कानपुर में तब न तो बसें चलती थीं और न साइकिल रिक्शे. सैंट्रल स्टेशन पर कभी एक-दो दिखने लगे थे. इक्के या तांगे या फिर पैदल. तो खादी खरीदी,- दो कुर्तों और पाजामों के लिए हलकी और एक शेरवानी के लिए कुछ मोटी. एक चूड़ीदार पाजामा भी बनवाने की सोची. इतने रुपयों में दो धोतियां भी ले लीं.

पांच दिनों के भीतर सब कपड़े तैयार करवा लिये. इस तरह पहली नौकरी के इंटरव्यू सें शामिल होने के लिए बम्बई की तैयारी कर ली. सब को उन्माद में सूचनाएं देता फिरा. पत्नी खुश भी थी और मेरे जाने की वजह से दुखी भी. बम्बई की दूरी और फिर लम्बा वियोग. मुन्ने अभी दो ही साल का था. मेरा उत्साह और अम्मा की उदासी उस की समझ के बाहर थी. भाभी भी बहुत प्रसन्न थीं. दादा हमेशा की तरह शान्त एवं निर्बोल. दद्दा जी खुश थे और अपने सेठों के और बम्बई के बारे में विस्तार से समझाते रहे. दरअसल वे हमेशा यही चाहते थे कि मैं व्यवसाय की मुड़ जाऊं. विदेशों के साथ ऐक्सपोर्ट-इम्पोर्ट का काम करूं. उन के छोटे सेठ सत्य नारायण जी ने इस क्षेत्र में कुछ धन्धा शुरू किया था. गो कि मालूम था कि व्यापार में मेरी रुचि नहीं है फिर भी वे आग्रह करते रहते थे. कानपुर और उन्नाव के सीमा पर गंगा जी के किनारे सोख़्ता आश्रम था, जहां श्री सोख़्ता जी रहते थे और उन के साथ इलाहाबाद के एक विद्यार्थी डा. राम भी रहते थे. गांधी जी की शैली पर आश्रम का काम-काज चल रहा था. मेरा कुछ सम्बन्ध उन से था. वहां भी जा कर उन से मिल आया. लोगों का कहना था कि सोख्ता जी जवाहरलाल नेहरू के भाई थे. चेहर-मोहरे और सूरत-शकल से तो ऐसा ही लगता था. शायद इस वजह से यह अफ़वाह चल निकली हो. कानपुर के आर्यनगर में पं. सदगुरु शरण अवस्थी और डा. श्री नारायण अग्निहोत्री रहते थे. बी.ऐन.ऐस.डी. कौलेज में वे हमें हिन्दी और अंग्रेज़ी पढ़ाते थे. उन के प्रति मेरे मन में बहुत सम्मान का भाव था. अवस्थी जी के ही प्रभाव के कारण हिन्दी साहित्य के प्रति मुझ में रुचि पैदा हुई थी. मुझ से मिल कर वे बहुत खुश हुए. सफलता के लिए शुभकामनाएं दीं.

इस तरह बड़ों के आशीर्वाद ले कर मैं बम्बई के लिए पंजाब मेल से रवाना हुआ. लखनऊ से एक ऐक्सप्रैस में बम्बई के लिए दो बोगियाँ लगती थीं. दद्दा जी ने अपनी गद्दी से मेरे लिए सैकिण्ड क्लास का एक टिकट मंगवा लिया था. सैकिण्ड क्लास में यात्रा की कल्पना भी न थी. दद्दा जी की इस उदारता से मन में उन के प्रति सम्मान का भव और भी बढ़ गया. अपनी महानता को गरिमा मिली, ऐसा लगा. उस ज़माने में इंटर क्लास भी होता था. वही मेरे लिए बहुत था. मुझे याद हो आया कि इस क्लास में तो पं. ब्रह्मानन्द मिश्र बम्बई आया-जाया करते थे. वे हमारे दादा के साले थे. यानी हमारी भाभी के सगे भाई, कानपुर के सफल वकील और नगरपालिका के लोकप्रिय चेअरमैन भी थे. वे अगर पहले दर्जे में भी सफ़र करते तो कोई बड़ी बात न होती. डिब्बे की ख़ुबसूरत लकड़ी की दीवालें, चमड़े के तीन सोफ़े, बाथरूम में शावर और कमोड देख कर मन प्रफुल्लित हो गया. ये दोनों बोगियां झांसी में पंजाब मेल से जोड़ी जाएंगी. तो जी.आई.पी. की इस मशहूर गाड़ी से बम्बई की 27 घंटे की शानदार यात्रा हुई. नैथानी वी.टी. पर मिले और सेंट ज़ेविअर्स कौलेज, घोड़ागाड़ी से, जिसे विक्टोरिया कहते हैं, ले गये. यह कौलेज वी.टी. से मुश्किल से एक किलोमीटर है. कौलेज के हौस्टल में स्वयं ठहरे हुए थे, उसी में मुझे भी ठहरना था. फादर बालागिअर ने पहले से यह व्यवस्था कर दी थी. मुंह से अनायास ही खुशी फूट निकली,- कितना दिव्य कितना भव्य.  

दीसरे दिन फादर से मिले. उन के इस अनुग्रह के लिए कृतज्ञता प्रकट की. सारे समय वे हिन्दी में ही बातें करते रहे. दो दिन बाद 27 जून को इंटरव्यू है, ऐसा मुझे बताते हुए कुछ टिप्स दीं. यह भी पूछा कि हौस्टल में कोई कष्ट तो नहीं. तो मैं ने भरे हुए गले से कहा, सारे जीवन हौस्टल में रहा हूं और ग़रीबी में दिन बिताये हैं, आप का हौस्टल तो महल का तरह है. लेकिन मैं 5 दिन से अधिक नहीं रुकूंगा. हौस्टल विद्यार्थियों के लिए है, जौब पाने के बाद मैं आप की सहृदयता और आतिथ्य का दुर्पयोग नहीं करना चाहूंगा. फादर ने कहा कि आप मेरे अतिथि हैं. जब तक मैं चाहूं, आप यहां ठहर सकते हैं. मैं 27 जून को इंटरव्यू में शामिल हुआ और चुन भी लिया गया, जो होना ही था. पद के लिए मैं ने कोई आवेदन भी नहीं दिया था, इसलिए इंटरव्यू में प्रिन्सिपल ने वैसे ही सवाल किये जिन से मेरे बारे में आवश्यक सूचना प्राप्त हो जाये. इस तरह मेरे BIODATA के पूरे होने पर DIRECTOR OF EDUCATION ने सीधे पूछा कि आप कब से काम शुरू कर सकते हैं. मेरा जवाब तैयार था, कल से . उन्हों ने पहली जुलाई से काम शुरू करने का आदेश दे कर इंटरव्यू समाप्त कर दिया. आये हुए अन्य प्रार्थी भुनभुनाते हुए वापस चले गये. मुझे पहली जुलाई से SYDENHAM COLLEGE OF COMMERCE AND ECONOMICS और   ELPHINSTONE COLLEGE के हिन्दी शिक्षक के पद के लिए नियुक्ति मिल गई. नैथानी के साथ जा कर सब से पहले फादर को खुशखबरी दी फिर दद्दा जी को तार भेज कर कानपुर के सभी लोगों को सूतित करवा दिया. इस तरह जीवन का एक नया अध्याय शुरू हो गया.