कहीं से कहीं नहीं

बेमन से लण्डन,
लण्डन से न्यूयार्क
टोकियो से हाँगकाँग
बम्बई सो कलकत्ता।
यहाँ-वहाँ, यत्र-तत्र-सर्वत्र
फिर भी कहीं-नहीं।
उतरता है जहाज़
फिर उड़ जाता है
धरती को छू कर।

लाखों कबूतरी दड़बे.
धरती से आसमान तक।
झिलमिलाते विज्ञापनों को
चीरती हुइ भागती सड़कें
चीखते सायरन
भागते लोग।
तरल मरकरी की तरह
वह रहा है सब-कुछ
न कहीं होना है
न कहीं जाना है
और न कुछ करना है।
कोई हाँक रहा है
फेनिल मुँह हम
केवल भाग रहे हैं।
“जोगिंग” कर रहे हैं।