• 15 मार्च 1943 में क्योस्लीन (जर्मनी) में जन्म हुआ। हाई स्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद 6 महीनों के लिए फिनलैण्ड के एक परिवार के साथ बाल-परिचारिका के रूप में काम किया।
  • पत्रकारिता सम्बन्धी प्रशिक्षण के लिए अनेक समाचार पत्रों में काम सीखा और 1965 से ए.पी. (ऐसोसिएटेड प्रैस) तथा ए.पी.डी. (एवांगेलिक चर्च की प्रैस एजैंसी) फ्रांकफुर्ट में लम्बे अर्से तक काम किया।
  • 1981 से 1989 तक गोएटे विश्वविद्यालय फ्रांकफुर्ट में समाज-शास्त्र का अध्ययन किया और मागिस्टर डिप्लोमा, जो एस.ए. के बराबर है, प्राप्त किया। साथ ही 1981-82 में भारत सरकार की छात्रवृत्ति पर दिल्ली के सैंट्रल इंस्टीट्यूट औफ़ हिन्दी में एक साल तक हिन्दी भाषा का अध्ययन किया।
  • अनेक सालों तक अवैतनिक रूप से फ्रांकफुर्ट की द्विराष्ट्रीय परिवारों की संस्था ई.ए.एफ़. में काम किया और साथ ही भारतीय संस्कृति संस्थान में पूरा योगदान किया।
  • अनेक सालों तक अन्तरसांस्कृतिक संचार एवं संवाद तथा तत्सम्बन्धी विषयों का स्वतंत्र रूप से अध्यापन किया. अदाहरण के लिए, होख़शूले फ्राकफुर्ट में.

हमारा स्थायी निवास-स्थान जर्मनी है, लेकिन 1993 से हम  नियमित रूप से हर साल कुछ महीने हरिद्वार, भारत में बिताते हैं।

  • गंगा तट पर बसे गाँव शिवपुरी, जिला राय बरेली, उत्तर प्रदेश  में 4 अगस्त 1924 को जन्मे।
  • गाँधी जी के अनुयायी के रूप में भारत की आज़ादी की लडा़ई में भाग लिया और 1942 के “भारत छोडो़“ आन्दोलन में गिरफ्तार हुए और राय बरेली के सैन्ट्ल जेल में रहे।
  • हिन्दी भाषा और साहित्य में प्रयाग विश्वविद्यालय से 1949 में एम.ए. किया और यूटरैष्ट विश्व-विद्यालय, हौलैँड से “Regionalism in Hindi Novels” विषय पर D.Litt.  की उपाधि मिली।
  • 1949 जुलाई से बम्बई विश्वविद्यालय के एलफिऩ्स्टन कौलेज में हिन्दी भाषा एवं साहित्य का
  • 1963 तक अध्यापन किया तथा विभागाध्यक्ष रहे। इस के बाद दक्षिण एशिया संस्थान, हाइडेलबर्ग, जर्मनी (1963-64), कैलीफो़र्निया विश्वविद्यालय बर्कले में (1964-65), रोमानिया के बुखारेष्ट विश्वविद्यालय में (1965-67) और तदुपरान्त जर्मनी के गोएटे विश्वविद्यालय, फ्रांकफुर्ट में 1967 से 1989 तक हिन्दी भाषा और साहित्य एवं भारतीय संस्कृति का अध्यापन किया। 1987 में काशी विद्यापीठ में और 1991 में चीन के बेजिंग विश्वविद्यलय में अतिथि प्रौफ़ेसर के रूप में  धर्म, लोक-साहित्य एवं हिन्दी साहित्य पर व्याख्यान प्रस्तुत किये।
  • 1950 से 1961 तक के काल में सैंट्रल बोर्ड औफ़ फ़िल्म सैंसर के सदस्य और राष्ट्रपति के पुरष्कार के लिए चयन समिति तथा आकाशवाणी के फिल्मी गीतों की चयन समिति के सदस्य रहे।
  • 1967 से जर्मनी के श्वालबाख़ नगर में स्थायी आवास बना लिया है. 1993 से हरिद्वार में भी गंगा तट पर एक छोटा-सा घर बना लिया है, जहां हर साल तीन-चार महीने बिताते हैं।
  • 1985 में सपत्नीक भारतीय संस्कृति संस्थान (Indisches Kultur-Institut) की स्थापना की जो आज भी सक्रिय है। लगभग बीस सालों तक सक्रिय संचालन किया।

हम विभिन्न संस्कृतियों के मध्य सेतु बनाने का काम कर रहे हैं। ऐसे काम में हम अपने दो देशों पर ही ध्यान रखते हैं, जहाँ हम ने घर बना लिये हैं। अथार्त, जर्मनी और भारत के मध्य, सामान्यरूप से, सभी अन्तरसांस्कृतिक समबन्धों पर। हम विभिन्न प्रकार के साधनों का उपयोग करते हैं, ज़्यादातर रचनात्मक एवं कलात्मक प्रकार के। काफ़ी समय तक यह काम विशेषतः लेखन तथा अनुवाद के मध्यम से किया। यह वेबसाइट इस उद्देश्य से बनायी गयी है, जिस से हम अपनी गतिविधियों में आप को शामिल कर सकें। यहाँ पर आप को ऐसी सूचनाएँ मिलेंगी, जिन से आप को हमारी पुरानी और नई रचनाओं से सम्पर्क प्राप्त होगा और साथ ही भविष्य की नई योजनाओं का भी पता लगेगा। इस तरह हम जिज्ञासुओं तक अपनी पुस्तकों की जानकारी पहुँचा सकेंगे। साथ ही उपेक्षित विषयों की ओर भी आप का ध्यान आकृष्ट कर सकेंगे। जर्मनी में समसामयिक भारतीय भाषाओं के सहित्य का ज्ञान बहुत कम है, उदाहरण के लिए हिंदी, जिस की ओर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। और भारत में, अन्तरसांस्कृतिक अध्ययन उपेक्षित विषय बने हुए हैं, गो कि विविधता के कारण देश में सामान्य उत्सुकता होनी चाहिए थी। हमारी वेबसाइट का यही उद्देश्य है कि इस से नई दिशाओं एवं दृष्टियों की प्रेरणा प्राप्त हो और हम में भी परिवर्तन के लिए उत्साह बढ़े। नयी सम्भावनाओं तथा परिवर्तनों की ओर हमें भी ध्यान देना पड़े। इसलिए, हम उत्सुकता से उन सभी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा करेंगे, जो हमें, आप जैसे, अपने दर्शकों से मिलती रहेंगी।